غزل

0

ریزہ ریزہ ہی  تھا مسمار پرانا گھر تھا

اپنے ہونے سے ہی بیزار پرانا گھر تھا

سلوٹیں جسم کی  جیسی ہی تھیں دیواروں پر

اور  نظروں میں  مگر پیار پرانا گھر تھا

تجربہ عمر میں پنہا تھا لیاقت جیسے

جیسے روشن کوی مینار پرانا گھر تھا

اکھڑا اکھڑا سا تھا لہجہ تو ٹپکتی چھت تھی

پر تھا سایہ بھی  فگن دار پرانا گھر تھا

بکھرا بکھرا تھا محبت میں مگر یکجا تھا

تھا ہمارا بھی تو غم خوار پرانا گھر تھا

کونا کونا تھا ہمارے لۓ پیرو کاری

اور خد کے لۓ نادار پرانا گھر تھا

خد کے ایمان کی بھی فکر دعا بھی سب کو

پھول ہی پھول تھے گلزار پرانا گھر تھا

شاہ جب سے وہ گیا درد کا درماں دیکر

پھول لگتے ہیں مجھے خار پرانا گھر تھا

रेज़ा रेजा़ ही था मस्मार पुराना घर था

अपने होने से ही बेज़ार पुराना घर था

सिलवटें जिस्म की जैसी ही थी दीवारों पर

और नज़रों में मगर प्यार पुराना घर था

तजरबा उम्र में पिन्हा था लियाकत जैसे

जैसे रौशन कोई मीनार पुराना घर था

उखड़ा‌ उखड़ा सा था लहजा तो टपकती छत थी

पर था साया भी फुगनदार पुराना घर था

बिखरा बिखरा था मुहब्बत में मगर यकजा था

था हमारा भी तो ग़मख़्वार पुराना घर था

कोना कोना था हमारे लिए पैरोकारी

और खु़द के लिए नादार पुराना घर था

खु़द के ईमान की भी फ़िक्र दुआ भी सब को

फूल ही फूल थे गुलज़ार पुराना घर था

शाह जब से वो गया दर्द का दरमां देकर

फूल लगते हैं मुझे खार पुराना घर था

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी